सिख धर्म के आठवें गुरु हरकिशन जी: करुणा और सेवा के प्रतीक(7 जुलाई 1656 -30 मार्च 1664 )

गुरु हरकिशन: करुणा और सेवा के प्रतीक


गुरु हरकिशन सिंह सिखों के आठवें गुरु थे, जिनका जन्म 7 जुलाई 1656 को किरतपुर साहिब, पंजाब में हुआ था। वे सिखों के सातवें गुरु, गुरु हर राय जी के छोटे पुत्र थे। गुरु हरकिशन को मात्र पांच वर्ष की आयु में, 7 अक्टूबर 1661 को गुरु गद्दी प्राप्त हुई। वे अपनी अल्पायु में ही अपनी करुणा, सेवा भाव और अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति के लिए प्रसिद्ध हो गए।

गुरु हरकिशन की शिक्षाएं और जीवन

गुरु हरकिशन ने अपने जीवनकाल में सेवा और दया को सर्वोपरि रखा। वे गरीबों और बीमारों की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे। उनके जीवन का सबसे प्रमुख उदाहरण 1664 में दिल्ली में फैले भयंकर महामारी (चेचक और प्लेग) के दौरान देखने को मिला। उन्होंने अपनी छोटी आयु के बावजूद, स्वयं को बीमारों की सेवा में समर्पित कर दिया। उनकी वाणी और स्पर्श से अनेक रोगियों को राहत मिली।

गुरु हरकिशन जी की शिक्षा हमें विनम्रता, सहानुभूति और आत्म-बलिदान की प्रेरणा देती है। वे हमें यह सिखाते हैं कि सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह समाज की सेवा और पीड़ितों की सहायता में प्रकट होती है।

दिल्ली में सेवा और बलिदान

गुरु हरकिशन को मुगल सम्राट औरंगजेब ने दिल्ली बुलाया था। वे दिल्ली आए और यमुना के किनारे स्थित राजा जयसिंह के महल (जो आज बंगला साहिब गुरुद्वारा के रूप में प्रसिद्ध है) में ठहरे। जब दिल्ली में महामारी फैली, तो गुरु हरकिशन ने बीमारों की देखभाल की और उन्हें सांत्वना दी। उन्होंने अपने अनुयायियों को भी सेवा कार्यों में लगाया। कहा जाता है कि उनके आशीर्वाद मात्र से ही कई लोग रोगमुक्त हो गए।

गुरु हरकिशन जी जल सेवा को भी अत्यधिक महत्व देते थे। जब महामारी फैल रही थी, तब उन्होंने लोगों को शुद्ध जल प्रदान करने के लिए अपने अनुयायियों को प्रेरित किया। यही कारण है कि आज भी बंगला साहिब गुरुद्वारे का पवित्र सरोवर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है।

हालांकि, अंततः वे स्वयं भी महामारी की चपेट में आ गए और 30 मार्च 1664 को मात्र आठ वर्ष की अल्पायु में अपने प्राण त्याग दिए। अपनी अंतिम सांसों में उन्होंने सिखों को समझाया कि अगला गुरु 'बाबा बकाला' (गुरु तेग बहादुर) होंगे। उनके ये अंतिम शब्द सिख समुदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुए।

गुरु हरकिशन की विरासत

गुरु हरकिशन का जीवन हमें सेवा, करुणा और निस्वार्थ प्रेम की प्रेरणा देता है। उनकी याद में दिल्ली में स्थित गुरुद्वारा बंगला साहिब बना, जो आज भी लाखों श्रद्धालुओं के लिए सेवा और श्रद्धा का केंद्र है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु गुरु हरकिशन की कृपा से जल सेवा और लंगर सेवा में भाग लेते हैं।

गुरु हरकिशन जी के जीवन से यह संदेश मिलता है कि मानवता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। उनकी शिक्षाएँ न केवल सिख समुदाय बल्कि समस्त मानवता के लिए प्रासंगिक हैं। वे आज भी अपनी सेवा भावना और दया के कारण लोगों के दिलों में जीवित हैं।

उनका जीवन यह दर्शाता है कि उम्र कभी भी सेवा और भक्ति के मार्ग में बाधा नहीं बन सकती। उनके कार्यों से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हमें सदैव जरूरतमंदों की सहायता करनी चाहिए और परोपकार की भावना को अपने जीवन में अपनाना चाहिए।


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