ओशो: रूढ़ियों के विध्वंसक और चेतना के उत्सव(11 दिसंबर 1931- 19 जनवरी 1990 )


ओशो: रूढ़ियों के विध्वंसक और चेतना के उत्सव(11 दिसंबर 1931- 19 जनवरी 1990 )

भूमिका

बीसवीं सदी के इतिहास में यदि कोई ऐसा व्यक्तित्व हुआ जिसने धर्म की जड़ता को हिलाकर रख दिया, तो वह निश्चित रूप से आचार्य रजनीश 'ओशो' थे। वे केवल एक आध्यात्मिक गुरु नहीं, बल्कि एक विद्रोही चेतना थे, जिन्होंने मनुष्य को परंपराओं की बेड़ियों से मुक्त होकर स्वयं की खोज के लिए प्रेरित किया। जहाँ संसार त्याग को ही धर्म मानता था, वहाँ ओशो ने 'जीवन के उत्सव' को ही वास्तविक प्रार्थना बताया।

जीवन यात्रा: कुचवाड़ा से पुणे तक

ओशो का जन्म 11 दिसंबर 1931 को मध्य प्रदेश के कुचवाड़ा में हुआ। उनके बचपन का नाम 'चंद्रमोहन जैन' था। उनका प्रारंभिक जीवन दर्शनशास्त्र के प्रति उनके गहन लगाव और सामाजिक बंधनों के प्रति विद्रोह से चिह्नित रहा।

बौद्धिक प्रखरता: दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में उन्होंने पुस्तकीय ज्ञान की सीमाओं को चुनौती दी।

 
महासंयम (Enlightenment): 21 मार्च 1953 को जबलपुर के भंवरताल उद्यान में उन्हें उस अवस्था की प्राप्ति हुई, जिसे वे 'अहंकार की मृत्यु' और 'चेतना का जागरण' कहते थे।

संन्यास की नवीन अवधारणा

ओशो ने संन्यास को भगवे वस्त्रों और हिमालय की कंदराओं से बाहर निकालकर आधुनिक मनुष्य के जीवन के बीच खड़ा कर दिया। उन्होंने नारा दिया— "संन्यास पलायन नहीं, उत्सव है।" उनका नव-संन्यास संसार को छोड़ने की नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए उससे अछूते रहने की कला थी।

ओशो दर्शन के मुख्य स्तंभ

ओशो का दर्शन किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि 'संपूर्ण मनुष्य' का दर्शन है। उनके विचारों को तीन मुख्य बिंदुओं में समझा जा सकता है:

सक्रिय ध्यान (Dynamic Meditation) 

आधुनिक मनुष्य के तनावपूर्ण जीवन को देखते हुए उन्होंने नाचने, चिल्लाने और श्वास के प्रयोगों से युक्त ध्यान पद्धतियाँ विकसित कीं।

संभोग से समाधि तक 

उन्होंने काम-ऊर्जा (Sex energy) को दबाने के बजाय उसे रूपांतरित कर परमात्मा की ओर ले जाने का साहसी मार्ग बताया, जिसे अक्सर गलत समझा गया। 

धर्म और अनुभव  

उनके लिए धर्म कोई शास्त्र या विश्वास नहीं था। वे कहते थे, "धर्म अनुभव है।" उन्होंने बुद्ध, कबीर, कृष्ण और लाओत्सु जैसे महानतम बुद्धों की व्याख्या को समकालीन परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया। 

वैश्विक विस्तार और विवाद

ओशो की लोकप्रियता जितनी बढ़ी, उनके इर्द-गिर्द विवादों का घेरा भी उतना ही गहरा हुआ।
 रजनीशपुरम (अमेरिका): 1980 के दशक में ओरेगन (USA) में एक भव्य शहर की स्थापना हुई, जो ओशो के 'वैश्विक गांव' के सपने का हिस्सा था।

 विरोध: तत्कालीन अमेरिकी सरकार और स्थानीय समुदायों के साथ उनके मतभेद, 'बायोटेरर अटैक' के आरोप और अंततः निर्वासन ने उनके जीवन को किसी थ्रिलर फिल्म जैसा बना दिया।

ओशो की विरासत: 'न जन्म, न मृत्यु'

पुणे स्थित ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिसॉर्ट आज भी दुनिया भर के साधकों के लिए एक तीर्थ के समान है। 19 जनवरी 1990 को जब उन्होंने देह छोड़ी, तो उनकी समाधि पर अंकित हुआ:

"ओशो: न कभी जन्मे, न कभी मरे; बस इस ग्रह पृथ्वी पर 11 दिसंबर 1931 से 19 जनवरी 1990 के बीच भ्रमण किया।"

निष्कर्ष: वे प्रश्न हैं, उत्तर नहीं

ओशो को केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है, उन्हें 'जीना' पड़ता है। वे एक ऐसे आइने की तरह हैं, जिसमें मनुष्य अपनी ही कुरूपताओं और अपनी ही अनंत संभावनाओं को देख सकता है। उन्होंने हमें सिखाया कि जीवन को किसी मंदिर या मस्जिद में नहीं, बल्कि श्वासों की लय और प्रेम की गहराई में तलाशना चाहिए।

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