भोगेंद्र झा: मिथिलांचल के जननायक और किसान आंदोलन के पुरोधा(13 सितंबर 1923- 24 जनवरी 2000)
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
भोगेंद्र झा का जन्म 13 सितंबर 1923 को बिहार के मधुबनी जिले के हरलाखी प्रखंड के कलना गाँव में हुआ था। छात्र जीवन से ही उनमें अन्याय के विरुद्ध लड़ने का जज्बा था। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा के दौरान ही स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू कर दिया था।
स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान भोगेंद्र झा ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा। उनका मानना था कि असली आजादी तभी आएगी जब देश के गरीब किसान और मजदूर साहूकारों और जमींदारों के शोषण से मुक्त होंगे।
किसान आंदोलन और वामपंथ
आजादी के बाद उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के माध्यम से अपनी राजनीतिक यात्रा जारी रखी। उन्होंने बिहार में 'बटाईदारी आंदोलन' और 'भूमि सुधार आंदोलन' का नेतृत्व किया।
हक-दोआ आंदोलन: उन्होंने किसानों को उनके हक दिलाने के लिए कई ऐतिहासिक पदयात्राएं कीं।
सादगी का प्रतीक: वे अपनी सादगी और बौद्धिक क्षमता के लिए जाने जाते थे। उन्हें "मिथिला का शेर" भी कहा जाता था।
संसदीय सफर
भोगेंद्र झा कई बार लोकसभा के सदस्य चुने गए। उन्होंने मधुबनी संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए संसद में जनता की आवाज को प्रखरता से उठाया।
उन्होंने 1967, 1971, 1980, 1989 और 1991 के चुनावों में जीत हासिल की।
संसद में वे कृषि नीतियों, बाढ़ नियंत्रण और रेल लाइनों के विस्तार जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने में माहिर थे।
मिथिलांचल के विकास का सपना
भोगेंद्र झा ने केवल राजनीति ही नहीं की, बल्कि उत्तर बिहार के आर्थिक विकास के लिए एक विजन भी रखा:
बाढ़ नियंत्रण: वे कोसी और कमला नदियों पर स्थायी बांध और जल प्रबंधन के प्रबल समर्थक थे ताकि हर साल होने वाली तबाही को रोका जा सके।
औद्योगिकीकरण: उन्होंने चीनी मिलों और स्थानीय उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए निरंतर संघर्ष किया।
मैथिली भाषा: मैथिली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करवाने के प्रयासों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
निधन और विरासत
24 जनवरी 2000 को इस महान जननायक का निधन हो गया। भोगेंद्र झा आज भी बिहार की राजनीति में ईमानदारी और वैचारिक प्रतिबद्धता के प्रतीक माने जाते हैं। उनके जाने के बाद मिथिलांचल ने एक ऐसा नेता खो दिया जो सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करता था।
"राजनीति उनके लिए सत्ता का साधन नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति की सेवा का माध्यम थी।"

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