डॉ. राजा रमन्ना: भारतीय परमाणु कार्यक्रम के महाशिल्पकार(28 जनवरी 1925- 24 सितंबर 2004)


डॉ. राजा रमन्ना: भारतीय परमाणु कार्यक्रम के महाशिल्पकार(28 जनवरी 1925- 24 सितंबर 2004)

डॉ. राजा रमन्ना आधुनिक भारत के उन यशस्वी वैज्ञानिकों में से हैं, जिन्होंने देश को वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता और सामरिक शक्ति के शिखर पर पहुँचाया। वे न केवल एक प्रख्यात परमाणु भौतिक विज्ञानी थे, बल्कि एक दूरदर्शी प्रशासक भी थे, जिन्होंने भारत के शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रमों की नींव रखी।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

डॉ. रमन्ना का जन्म 28 जनवरी 1925 को कर्नाटक के तुमकुर जिले में हुआ। एक संस्कृत विद्वान परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत विरासत में मिली।
 उच्च शिक्षा: उन्होंने किंग्स कॉलेज, लंदन से भौतिकी में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की

 प्रतिभा: छात्र जीवन से ही वे गणित और जटिल भौतिकी के रहस्यों को सुलझाने में असाधारण थे।

 वैज्ञानिक यात्रा और परमाणु कार्यक्रम

भारत लौटने पर उन्होंने भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) में अपनी सेवाएँ शुरू कीं और डॉ. होमी जे. भाभा के विश्वसनीय सहयोगी बने।

 पोखरण-I (1974): डॉ. रमन्ना भारत के पहले सफल परमाणु परीक्षण के मुख्य सूत्रधार थे। इस ऐतिहासिक घटना ने विश्व पटल पर भारत की धाक जमा दी।

 निदेशक पद: वे BARC के निदेशक बने और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के क्षेत्र में अभूतपूर्व शोध किए।

 प्रशासनिक और राष्ट्रीय भूमिका

वे विज्ञान को प्रयोगशाला से निकालकर राष्ट्रनिर्माण की मुख्यधारा में ले आए। उनकी प्रमुख भूमिकाएँ निम्नलिखित रहीं:

परमाणु ऊर्जा आयोग - अध्यक्ष के रूप में परमाणु नीतियों का निर्धारण |
रक्षा मंत्रालय - रक्षा राज्य मंत्री के रूप में सामरिक सुरक्षा को सुदृढ़ किया |
CSIR - महानिदेशक के रूप में वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा दिया |

सम्मान और उपलब्धियाँ
राष्ट्र के प्रति उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें कई सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा गया:
 
पद्म विभूषण (1975): विज्ञान और इंजीनियरिंग में असाधारण योगदान हेतु।

पद्म भूषण: उनकी विशिष्ट राष्ट्रीय सेवाओं के लिए।

 अकादमिक: भारतीय विज्ञान अकादमी के अध्यक्ष और कई 

विश्वविद्यालयों से मानद उपाधियाँ।

व्यक्तित्व और विचार

डॉ. रमन्ना का व्यक्तित्व सादगी और अनुशासन का मिश्रण था। विज्ञान के साथ-साथ उन्हें संगीत (पियानो) में भी गहरी रुचि थी। उनका मानना था कि:

 "विज्ञान तभी सार्थक है, जब वह राष्ट्र और समाज की सेवा करे।"

उन्होंने हमेशा युवाओं को तर्कशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया।

 निष्कर्ष और विरासत

24 सितंबर 2004 को इस महान विभूति का निधन हुआ। डॉ. राजा रमन्ना ने सिद्ध किया कि सीमित संसाधनों के बावजूद दृढ़ संकल्प और स्पष्ट दृष्टि से भारत वैश्विक मंच पर सशक्त बन सकता है। वे आज भी भारतीय वैज्ञानिकों के लिए स्वाभिमान और प्रेरणा के प्रतीक हैं।

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