दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी (22 अक्टूबर 1932- 12 जनवरी 2026)
भूमिका
दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का जीवन और उनका व्यक्तित्व भारतीय राजशाही के उस युग का प्रतिनिधित्व करता है जो सेवा, दान और परंपराओं के प्रति निष्ठा के लिए जाना जाता है। उनके निधन से न केवल एक युग का अंत हुआ है, बल्कि मिथिलांचल की संस्कृति का एक महान स्तंभ भी ओझल हो गया है।
प्रारंभिक जीवन और विवाह
महारानी कामसुंदरी देवी का जन्म 22 अक्टूबर 1932 को बिहार के मधुबनी जिले के मंगरौनी गांव में हुआ था। मंगरौनी अपनी विद्वता और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध रहा है।
बाल विवाह: उस दौर की सामाजिक परंपराओं के अनुसार, मात्र 8 वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह दरभंगा के अंतिम महाराजा कामेश्वर सिंह के साथ हुआ था।
तीसरी महारानी: वे महाराजा की तीसरी और अंतिम पत्नी थीं। छोटी उम्र में राजमहल में आने के बावजूद उन्होंने राजसी मर्यादाओं को आत्मसात किया और महाराजा की विश्वस्त जीवनसंगिनी बनीं।
समाज सेवा और शिक्षा में योगदान
महारानी केवल राजमहल की शोभा नहीं थीं, बल्कि उन्होंने समाज के उत्थान में सक्रिय भूमिका निभाई। महाराजा कामेश्वर सिंह के साथ मिलकर उन्होंने मिथिलांचल में शिक्षा और स्वास्थ्य की नींव रखी:
संस्थानों की स्थापना: कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय और कई महत्वपूर्ण कॉलेजों व अस्पतालों के निर्माण में उनका अप्रत्यक्ष लेकिन महत्वपूर्ण सहयोग रहा।
मिथिला कला को प्रोत्साहन: उन्होंने स्थानीय कलाकारों और मिथिला की लोक कला (मधुबनी पेंटिंग) को संरक्षित करने के लिए सदैव प्रयास किए।
देशभक्ति और अभूतपूर्व दान
महारानी कामसुंदरी देवी का नाम भारतीय इतिहास में उनके स्वर्ण दान के लिए स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
1962 का भारत-चीन युद्ध: जब देश पर संकट आया, तो प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की अपील पर उन्होंने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा।
600 किलो सोना: उन्होंने युद्ध कोष के लिए 600 किलो सोना दान कर दिया। यह दान उस समय की उनकी गहरी देशभक्ति और त्याग का परिचायक था, जो आज भी विरले ही देखने को मिलता है।
सरल और संयमी व्यक्तित्व
महाराजा कामेश्वर सिंह के निधन के बाद भी उन्होंने अपनी गरिमा और सादगी को बनाए रखा।
आध्यात्मिक जीवन: उन्होंने अपना अधिकांश समय पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठानों और दरभंगा राज की परंपराओं को जीवित रखने में व्यतीत किया।
संवेदनशीलता: वे अपने कर्मचारियों और प्रजा के प्रति अत्यंत दयालु थीं। राजशाही समाप्त होने के बाद भी वे लोगों के लिए "महारानी" ही बनी रहीं।
एक युग का अंत
12 जनवरी 2026 को 94 वर्ष की आयु में महारानी कामसुंदरी देवी ने अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ ही दरभंगा राज की जीवंत शाही परंपरा का अंतिम अध्याय भी समाप्त हो गया। उनके सम्मान में पूरा मिथिलांचल और बिहार राज्य शोकग्रस्त रहा, क्योंकि वे उस गौरवशाली इतिहास की अंतिम साक्षी थीं।

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