सरदार अजीत सिंह: स्वतंत्रता संग्राम के महानायक(23 फरवरी 1881-15 अगस्त 1947 )

सरदार अजीत सिंह: स्वतंत्रता संग्राम के महानायक


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई ऐसे वीर योद्धा हुए हैं, जिन्होंने अपने साहस और त्याग से भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया। इन्हीं वीरों में से एक थे सरदार अजीत सिंह संधू, जो एक प्रखर राष्ट्रवादी, क्रांतिकारी और किसान हितैषी नेता थे। उनका जीवन संघर्ष, बलिदान और मातृभूमि के प्रति अनन्य प्रेम की अनुपम गाथा है।

प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा

23 फरवरी 1881 को पंजाब के जालंधर जिले (वर्तमान में शहीद भगत सिंह नगर) के खटकर कलां गांव में जन्मे अजीत सिंह एक जाट सिख परिवार से थे। उनके पिता अर्जन सिंह और माता जय कौर ने उन्हें शिक्षा के प्रति प्रेरित किया। उन्होंने साईंदास एंग्लो संस्कृत स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और उच्च शिक्षा के लिए बरेली के लॉ कॉलेज में प्रवेश लिया। किंतु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रति उनकी गहरी निष्ठा के कारण उन्होंने अपनी कानूनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी।

क्रांतिकारी गतिविधियाँ एवं स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

सरदार अजीत सिंह ब्रिटिश हुकूमत की दमनकारी नीतियों के खिलाफ शुरू से ही संघर्षरत रहे। 1906 में पंजाब उपनिवेश अधिनियम (संशोधन) और बारी दोआब नहर अधिनियम के विरोध में उन्होंने किसानों का नेतृत्व किया और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ा।

पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन

1907 में, उन्होंने पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन का नेतृत्व किया, जो किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण विद्रोह था। इस आंदोलन का नारा "पगड़ी संभाल जट्टा" पूरे पंजाब में गूंज उठा और किसानों को संगठित करने का माध्यम बना। इस आंदोलन से ब्रिटिश हुकूमत भयभीत हो गई और मई 1907 में उन्हें लाला लाजपत राय के साथ बर्मा (म्यांमार) के मांडले में निर्वासित कर दिया गया। लेकिन भारतीय जनता के दबाव के कारण 11 नवंबर 1907 को उन्हें रिहा कर दिया गया।

विदेशी निर्वासन और ग़दर पार्टी से जुड़ाव

ब्रिटिश सरकार की निगाहों से बचने के लिए 1909 में सरदार अजीत सिंह ईरान चले गए, जहाँ से उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों को जारी रखा। उन्होंने यूरोप, ब्राज़ील और अफ्रीका में रहकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्थन जुटाया। 1918 में, वे सैन फ्रांसिस्को में ग़दर पार्टी के संपर्क में आए और क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहे।

उनका उद्देश्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अंतरराष्ट्रीय समर्थन दिलाना था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने नेपल्स विश्वविद्यालय में फ़ारसी पढ़ाई और भारतीय सैनिकों को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।

भारत वापसी और अंतिम समय

लंबे समय तक विदेश में निर्वासन में रहने के बाद, सरदार अजीत सिंह जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप से 7 मार्च 1947 को भारत लौटे। उन्होंने कुछ समय दिल्ली में बिताया और फिर डलहौजी चले गए।

15 अगस्त 1947 को, जिस दिन भारत स्वतंत्र हुआ, उसी दिन इस महान क्रांतिकारी ने अंतिम सांस ली। उनकी समाधि पंजपुला, डलहौजी में स्थित है, जो उनके अद्वितीय योगदान की याद दिलाती है।

विरासत एवं योगदान

सरदार अजीत सिंह ने भारत माता सोसाइटी की स्थापना की और "भारत माता" पत्रिका का प्रकाशन किया। उनका जीवन प्रेरणा का स्रोत बना और उनके भतीजे भगत सिंह ने उनसे क्रांतिकारी विचारधारा को आत्मसात किया।

उनकी अंतिम वसीयत में उन्होंने कहा:

"हमारा भारत दुर्भाग्य से टुकड़ों में बँट गया। विदेशी शासकों द्वारा बोए गए विभाजन के बीज अब मातृभूमि के विखंडन के रूप में अपने विनाशकारी फल दे रहे हैं।"

उपसंहार

सरदार अजीत सिंह केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वे अद्वितीय योद्धा थे, जिन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण देश के लिए समर्पित कर दिया। उनका संघर्ष, बलिदान और अदम्य साहस भारत के स्वतंत्रता संग्राम का स्वर्णिम अध्याय है। उनका नाम सदैव सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता रहेगा।


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