महादेव गोविंद रानाडे : भारतीय सामाजिक-धार्मिक पुनर्जागरण के अग्रदूत(18 जनवरी 1842 - 16 जनवरी 1901 )


महादेव गोविंद रानाडे : भारतीय सामाजिक-धार्मिक पुनर्जागरण के अग्रदूत(18 जनवरी 1842 - 16 जनवरी 1901 )

भूमिका

महादेव गोविंद रानाडे उन्नीसवीं शताब्दी के भारत के उन महान चिंतकों में अग्रणी हैं, जिन्होंने औपनिवेशिक भारत में सामाजिक सुधार, धार्मिक उदारवाद, आर्थिक चिंतन और संवैधानिक राष्ट्रवाद को एक साथ दिशा दी। वे न्यायाधीश, विद्वान, इतिहासकार, अर्थशास्त्री, समाज-सुधारक और राष्ट्रवादी विचारक थे। रानाडे का जीवन भारतीय समाज को रूढ़ियों से मुक्त कर आधुनिक, मानवीय और न्यायपूर्ण बनाने के सतत प्रयास का प्रतीक है।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

महादेव गोविंद रानाडे का जन्म 18 जनवरी 1842 को महाराष्ट्र के नासिक ज़िले में स्थित निफाड़ के एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ। बचपन से ही वे मेधावी, अनुशासित और अध्ययनशील थे। प्रारंभिक शिक्षा मराठी और संस्कृत में हुई, जिससे भारतीय परंपरा की गहरी समझ विकसित हुई।
उच्च शिक्षा के लिए वे बंबई (वर्तमान मुंबई) गए, जहाँ एलफिंस्टन कॉलेज से उन्होंने 1862 में बी.ए. और 1864 में एल.एल.बी. की डिग्री प्राप्त की। अंग्रेज़ी शिक्षा के साथ-साथ भारतीय इतिहास, दर्शन और समाजशास्त्र में उनकी गहरी रुचि बनी रही।

न्यायिक जीवन

रानाडे ने अपने करियर की शुरुआत शिक्षक के रूप में की, पर शीघ्र ही वे न्यायिक सेवा में आए। 1871 में वे बंबई उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त हुए। न्यायाधीश के रूप में उनकी पहचान निष्पक्षता, मानवीय दृष्टिकोण और सामाजिक संवेदनशीलता के लिए बनी। कानून की कठोरता के बीच वे न्याय के नैतिक पक्ष को महत्व देते थे।

सामाजिक सुधारक के रूप में योगदान

रानाडे भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों—जैसे बाल विवाह, विधवा-अवस्था की कठोरता, जातिगत भेदभाव और स्त्री-अशिक्षा—के प्रखर विरोधी थे।
विधवा पुनर्विवाह: वे विधवा पुनर्विवाह के प्रबल समर्थक थे। स्वयं उन्होंने सामाजिक दबाव के बावजूद विधवा से विवाह कर उदाहरण प्रस्तुत किया।
स्त्री शिक्षा: रानाडे का विश्वास था कि समाज का वास्तविक उत्थान स्त्रियों की शिक्षा और सम्मान से ही संभव है।
प्रार्थना समाज: 1867 में उन्होंने प्रार्थना समाज की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह संस्था धार्मिक उदारवाद, एकेश्वरवाद, नैतिकता और सामाजिक सुधार की पक्षधर थी।
बाल विवाह विरोध: उन्होंने बाल विवाह की आलोचना की और विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाने के पक्ष में तर्क दिए।

धार्मिक और दार्शनिक दृष्टि

रानाडे धर्म को मानव-कल्याण का साधन मानते थे, न कि रूढ़ियों का संग्रह। वे मानते थे कि हिंदू धर्म समय के साथ विकसित होता रहा है और उसे सामाजिक प्रगति के अनुरूप पुनर्व्याख्यायित किया जाना चाहिए।
उनकी प्रसिद्ध कृति “द राइज़ ऑफ़ द मराठा पावर” (मराठा शक्ति का उदय) में इतिहास को सामाजिक-धार्मिक संदर्भों के साथ प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने संत परंपरा—नामदेव, तुकाराम, ज्ञानेश्वर—को सामाजिक समता और नैतिक चेतना का स्रोत माना।

आर्थिक चिंतन

रानाडे भारत के प्रारंभिक आर्थिक चिंतकों में गिने जाते हैं। वे मानते थे कि औपनिवेशिक शासन की आर्थिक नीतियाँ भारत के औद्योगिक विकास में बाधक हैं।
स्वदेशी उद्योग: उन्होंने कुटीर और लघु उद्योगों के संरक्षण का समर्थन किया।
कृषि सुधार: किसानों की दयनीय स्थिति पर उन्होंने गहन विचार किया और भूमि-राजस्व सुधारों की आवश्यकता बताई।
राज्य की भूमिका: रानाडे का मत था कि राज्य को शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

राजनीतिक विचार और राष्ट्रवाद

रानाडे भारतीय राष्ट्रवाद के संवैधानिक और उदारवादी धड़े के प्रमुख विचारक थे। वे हिंसक संघर्ष के बजाय क्रमिक सुधार, संवैधानिक उपायों और जन-चेतना के विकास में विश्वास रखते थे।
वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारंभिक समर्थकों में थे और गोपाल कृष्ण गोखले जैसे नेताओं के वैचारिक गुरु माने जाते हैं। रानाडे का मानना था कि स्वराज की प्राप्ति के लिए सामाजिक सुधार अनिवार्य है—राजनीतिक स्वतंत्रता सामाजिक पिछड़ेपन के साथ अधूरी रहेगी।

साहित्यिक और बौद्धिक योगदान

रानाडे ने अंग्रेज़ी और मराठी—दोनों भाषाओं में लेखन किया। उनके निबंध इतिहास, समाजशास्त्र, धर्म और अर्थशास्त्र के विषयों को समेटते हैं।
उनकी लेखनी का मूल स्वर समन्वय था—परंपरा और आधुनिकता, धर्म और विवेक, राष्ट्रीयता और मानवता का संतुलन।

निधन और विरासत

16 जनवरी 1901 को महादेव गोविंद रानाडे का निधन हुआ। उनका जीवन अपेक्षाकृत अल्प रहा, किंतु प्रभाव अत्यंत व्यापक।
आज रानाडे को एक ऐसे विचारक के रूप में स्मरण किया जाता है जिन्होंने भारतीय समाज को आत्मालोचन, सुधार और प्रगति की राह दिखायी। उनकी दृष्टि में सामाजिक न्याय, स्त्री-सम्मान, धार्मिक उदारता और संवैधानिक राष्ट्रवाद—ये सभी एक-दूसरे से अविभाज्य थे।

उपसंहार

महादेव गोविंद रानाडे भारतीय नवजागरण के मूक शिल्पी थे। वे न तो उग्र क्रांतिकारी थे, न ही यथास्थितिवादी—वे सुधारक विवेक के प्रतिनिधि थे। आज जब समाज परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व से गुजर रहा है, रानाडे के विचार हमें संतुलन, सहिष्णुता और मानवीय प्रगति का मार्ग दिखाते हैं।

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