कमलेश्वर : नई कहानी आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर((6 जनवरी 1932 – 27 जनवरी 2007)
भूमिका
हिंदी साहित्य के आधुनिक इतिहास में कमलेश्वर (6 जनवरी 1932 – 27 जनवरी 2007) एक ऐसे रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिन्होंने कथा-साहित्य को सामाजिक यथार्थ, राजनीतिक चेतना और मानवीय संवेदना से गहराई से जोड़ा। वे कथाकार, उपन्यासकार, निबंधकार, संपादक और मीडिया-व्यक्ति—इन सभी रूपों में समान रूप से प्रभावशाली रहे। ‘नई कहानी’ आंदोलन को वैचारिक धार देने और उसे जन-सरोकारों से जोड़ने में उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
जीवन परिचय
कमलेश्वर का जन्म मैनपुरी (उत्तर प्रदेश) में हुआ। आरंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। छात्र जीवन से ही वे साहित्य और सामाजिक प्रश्नों के प्रति सजग थे। पत्रकारिता और संपादन से जुड़े रहते हुए उन्होंने साहित्यिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की। उनका जीवन संघर्ष, प्रतिबद्धता और रचनात्मक साहस का उदाहरण है।
साहित्यिक यात्रा और वैचारिक दृष्टि
कमलेश्वर ‘कला के लिए कला’ के बजाय जीवन के लिए कला के पक्षधर थे। उनकी रचनाओं में व्यक्ति के अंतर्द्वंद्व, मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाएँ, सत्ता-संरचनाओं की क्रूरता और नैतिक संकटों का यथार्थ चित्रण मिलता है। वे मानते थे कि साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, समाज-परिवर्तन का औज़ार भी है।
‘नई कहानी’ आंदोलन के प्रमुख स्तंभों—मोहन राकेश, राजेंद्र यादव—के साथ मिलकर उन्होंने कथा को भावुकता से निकालकर यथार्थ, मनोविज्ञान और सामाजिक चेतना की ठोस जमीन पर खड़ा किया।
प्रमुख कृतियाँ
कहानी-संग्रह
राजा निरबंसिया
खोई हुई दिशाएँ
आदमी और इंसान
इन कहानियों में आम आदमी की पीड़ा, रिश्तों की टूटन और सामाजिक विसंगतियाँ तीव्रता से उभरती हैं।
उपन्यास
कितने पाकिस्तान — उनकी सर्वाधिक चर्चित कृति। यह उपन्यास विभाजन की त्रासदी को इतिहास, राजनीति और मनुष्य की संवेदना—तीनों स्तरों पर प्रश्नांकित करता है।
समुद्र में खोया हुआ आदमी
एक सड़क सत्तावन गलियाँ
इन उपन्यासों में समय, सत्ता और व्यक्ति के संबंधों की जटिलता दिखाई देती है।
निबंध और आलोचना
जो कहानी नहीं लिखते
साहित्य और समाज
इनमें उनका वैचारिक पक्ष, साहित्यिक जिम्मेदारी और रचनात्मक आत्मालोचन स्पष्ट होता है।
पत्रकारिता और संपादन
कमलेश्वर ने ‘सारिका’, ‘कथायात्रा’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन किया। उनके संपादन में पत्रिकाएँ केवल साहित्यिक मंच नहीं रहीं, बल्कि वैचारिक हस्तक्षेप का माध्यम बनीं। उन्होंने नई प्रतिभाओं को अवसर दिया और बहस की संस्कृति को प्रोत्साहित किया।
मीडिया में योगदान
वे दूरदर्शन से भी जुड़े रहे और ‘परिक्रमा’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से साहित्य और संस्कृति को जन-जन तक पहुँचाया। मीडिया में रहते हुए भी उन्होंने साहित्यिक मूल्यों से समझौता नहीं किया।
भाषा और शिल्प
कमलेश्वर की भाषा सरल, सटीक और प्रभावशाली है। वे प्रतीकों और संवादों के माध्यम से गहरी बात कह जाते हैं। कथ्य और शिल्प का संतुलन उनकी विशेषता है—न तो अनावश्यक अलंकरण, न ही शुष्कता।
पुरस्कार और सम्मान
साहित्य अकादमी पुरस्कार (कितने पाकिस्तान)
पद्मश्री सहित अनेक सम्मान
ये पुरस्कार उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा के साक्ष्य हैं।
साहित्यिक महत्व और विरासत
कमलेश्वर ने हिंदी कथा को आधुनिक संवेदना, ऐतिहासिक चेतना और राजनीतिक विवेक से समृद्ध किया। उन्होंने यह स्थापित किया कि लेखक का दायित्व केवल सौंदर्य रचना नहीं, बल्कि समय से संवाद भी है। उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे मनुष्य, समाज और सत्ता के स्थायी प्रश्न उठाती हैं।
उपसंहार
कमलेश्वर हिंदी साहित्य के उन दुर्लभ रचनाकारों में हैं, जिन्होंने लेखन, संपादन और मीडिया—तीनों क्षेत्रों में समान प्रभाव छोड़ा। वे विचार की निर्भीकता और संवेदना की ईमानदारी के प्रतीक थे। हिंदी साहित्य में उनका स्थान स्थायी है और उनकी कृतियाँ आने वाली पीढ़ियों को सोचने, सवाल करने और सच के साथ खड़े होने की प्रेरणा देती रहेंगी।

0 Comments
Thank you