राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्थापना दिवस: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, दार्शनिक चेतना एवं सांगठनिक विकास यात्रा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्थापना दिवस: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, दार्शनिक चेतना एवं सांगठनिक विकास यात्रा



डॉo संतोष आनन्द मिश्र, इतिहासकार, लेखक, ब्लॉगर, साहित्यकार, मिश्रौली, दरभंगा, बिहार 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संघ स्थापना का मूल संदर्भ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के शुभ अवसर पर महाराष्ट्र के नागपुर शहर में हुई थी। इसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (जिन्हें संघ परंपरा में 'डॉक्टरजी' के नाम से जाना जाता है) पेशे से एक चिकित्सक थे और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय सेनानी थे। डॉ. हेडगेवार की प्रारंभिक राजनीतिक चेतना का निर्माण नागपुर में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों और तत्पश्चात कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में अपनी मेडिकल शिक्षा के दौरान 'अनुशीलन समिति' जैसे क्रांतिकारी संगठनों के जीवंत संपर्क से हुआ था। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सक्रिय भूमिका निभाई, नागपुर प्रांतीय कांग्रेस समिति के सचिव के रूप में कार्य किया और 1921 के असहयोग आंदोलन में भाग लेते हुए कारावास की सजा भी काटी।
स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न धाराओं से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ने और स्वतंत्रता संग्राम की आंतरिक कार्यप्रणाली का सूक्ष्म अवलोकन करने के पश्चात डॉ. हेडगेवार इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत की राजनीतिक पराधीनता केवल एक बाह्य घटनाक्रम नहीं थी, बल्कि यह भारतीय समाज में व्याप्त गहरे आंतरिक दोषों का परिणाम थी। उनके विश्लेषणात्मक चिंतन के अनुसार, भारत पर विदेशी आक्रमणकारियों और तत्पश्चात ब्रिटिश हुकूमत के सफल होने का मुख्य कारण देश में अपार सैन्य क्षमता या सांस्कृतिक विरासत की कमी नहीं थी, बल्कि समाज में व्याप्त आत्म-विस्मृति, व्यक्तिगत स्वार्थपरता, सामूहिक अनुशासन का अभाव और विभिन्न जातिगत तथा क्षेत्रीय श्रेणियों में बटा होना था।
विनायक दामोदर सावरकर की कृति 'एसेंशियल्स ऑफ हिंदुत्व', समर्थ रामदास रचित 'दासशोध', लोकमान्य तिलक के 'गीता रहस्य' और मैजिनी जैसे पाश्चात्य चिंतकों के विचारों से प्रभावित होकर डॉ. हेडगेवार ने यह स्पष्ट रेखांकित किया कि केवल औपनिवेशिक सत्ता को उखाड़ फेंकना या राजनीतिक अधिकार प्राप्त कर लेना ही स्थायी राष्ट्र-निर्माण के लिए पर्याप्त नहीं है। उनका मानना था कि यदि समाज संगठित, अनुशासित और चरित्रवान नहीं होगा, तो प्राप्त की गई स्वतंत्रता भी पुनः संकट में पड़ सकती है। इसी दीर्घकालिक वैचारिक दृष्टि से प्रेरित होकर उन्होंने 'व्यक्ति निर्माण' (चरित्र गठन) के माध्यम से संपूर्ण समाज को संगठित करने के उद्देश्य से एक अनूठे स्वयंसेवी संगठन की नींव रखी, जिसका औपचारिक प्रारंभ नागपुर के सुकरावाड़ी स्थित उनके आवास और मोहिते बाड़ा के प्रांगण में युवाओं की एक लघु उपस्थिति के साथ हुआ।

विजयादशमी का चयन: दार्शनिक प्रासंगिकता एवं सीमोल्लंघन का विचार


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना दिवस के रूप में विजयादशमी का चयन कोई यादृच्छिक ऐतिहासिक संयोग नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक सुविचारित वैचारिक और सांस्कृतिक दर्शन निहित था। भारतीय सांस्कृतिक चेतना में विजयादशमी (दशहरा) अधर्म पर धर्म की, असत्य पर सत्य की और संगठित पुण्य-शक्ति की आसुरी प्रवृत्तियों पर शाश्वत विजय का प्रतीक है। यह तिथि पौराणिक एवं ऐतिहासिक रूप से भगवान श्री राम द्वारा रावण के संहार, महिषासुर पर मां दुर्गा की विजय और पांडवों द्वारा अपने अज्ञातवास की समाप्ति पर शमी वृक्ष से पुनः अस्त्र-शस्त्र ग्रहण करने जैसी युगांतरकारी घटनाओं से आच्छादित है।
डॉ. हेडगेवार ने इस पारंपरिक सांस्कृतिक पर्व को आधुनिक राष्ट्र-निर्माण की दृष्टि से एक नया अर्थ प्रदान किया। संघ चिंतन के अनुसार, विजयादशमी पर 'विजय' का अर्थ केवल किसी बाह्य शत्रु को परास्त करना नहीं है, बल्कि समाज के भीतर विद्यमान अज्ञान, निष्क्रियता, हीनभावना और अलगाववाद जैसी आंतरिक कमियों पर विजय प्राप्त करना है। इस संदर्भ में संघ ने यह प्रतिपादित किया कि आदर्श और संस्कृति केवल भाषणों से सुरक्षित नहीं रह सकते; उनके संरक्षण के लिए संगठित और अनुशासित 'शक्ति' (सामर्थ्य) का होना अनिवार्य है।
इसके अतिरिक्त, विजयादशमी के साथ जुड़ा 'सीमोल्लंघन' (सीमा का अतिक्रमण कर आगे बढ़ना) का पारंपरिक विचार, जो प्राचीन काल में राजाओं की सैन्य अभियानों से संबंधित था, संघ द्वारा एक सामाजिक पुनर्जागरण के रूप में पुनर्व्याख्यायित किया गया। संघ के वैचारिक ढांचे में सीमोल्लंघन का अर्थ समाज को विभाजित करने वाली जातिगत, भाषाई और प्रांतीय दीवारों को लांघकर एक एकात्मक राष्ट्र-पुरुष के रूप में खड़े होना है। इस प्रकार, विजयादशमी का दिन व्यक्ति के भीतर निहित स्वार्थ को राष्ट्रहित में समर्पित करने और राष्ट्र को उसके 'परम वैभव' पर पहुँचाने के संकल्प का प्रतीक बन गया।

स्थापना दिवस के प्रमुख अनुष्ठान एवं सांगठनिक कार्यप्रणाली

प्रत्येक वर्ष विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने स्थापना दिवस को एक विशेष सांगठनिक अनुष्ठान के रूप में देश-विदेश की समस्त शाखाओं में आयोजित करता है। इस उत्सव का आयोजन तीन प्रमुख स्तंभों पर टिका हुआ है, जो संघ की वैचारिक और व्यावहारिक कार्यप्रणाली को दर्शाते हैं।
प्रथम अनुष्ठान 'शस्त्र पूजन' है, जो विजयादशमी की प्राचीन भारतीय परंपरा का एक अभिन्न अंग है। संघ कार्यक्रमों में प्रतीकात्मक रूप से अस्त्र-शस्त्रों और लाठी (दंड) का विधि-विधान से पूजन किया जाता है। संघ दर्शन में शस्त्र पूजन का आशय हिंसा का प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना है कि समाज की रक्षा, धर्म के पालन और शांति की स्थापना के लिए सामर्थ्य एवं शक्ति का होना नितांत आवश्यक है। यह अनुष्ठान इस विचार को पुष्ट करता है कि शक्ति जब नीतिमत्ता और धर्म के नियंत्रण में होती है, तभी वह लोक-कल्याण का साधन बनती है।
द्वितीय अनुष्ठान 'पथ संचलन' (रूट मार्च) है, जिसमें पूर्ण गणवेश (आधिकारिक पोशाक) में सुसज्जित स्वयंसेवक वाद्य वृंद (घोष) की ताल पर अनुशासित कदमताल करते हुए नगरों और गांवों के मुख्य मार्गों से गुजरते हैं। पथ संचलन केवल एक शारीरिक संचलन नहीं है, बल्कि यह समाज के समक्ष अनुशासित, निस्वार्थ और संगठित नागरिक शक्ति का एक प्रत्यक्ष प्रकटीकरण है। इस अवसर पर नागरिक स्थान-स्थान पर पुष्पवर्षा कर संचलन का स्वागत करते हैं, जो समाज और संगठन के मध्य घनिष्ठ एकात्मता का प्रतीक है।
तृतीय और सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक अनुष्ठान 'सरसंघचालक का वार्षिक संबोधन' है, जो नागपुर के ऐतिहासिक रेशिमबाग मैदान में आयोजित होता है। विजयादशमी के दिन आरएसएस के सरसंघचालक (प्रधान मार्गदर्शक) का भाषण वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक और नीतिगत वक्तव्य माना जाता है। इस संबोधन में सरसंघचालक देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा, आर्थिक प्राथमिकताओं, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चुनौतियों और समकालीन वैश्विक परिदृश्य पर संघ के आधिकारिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करते हैं। इस वार्षिक आयोजन में देश के विभिन्न क्षेत्रों (विज्ञान, कला, सामाजिक कार्य, सशस्त्र बल आदि) की ख्यातिप्राप्त हस्तियों को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करने की एक सुदीर्घ परंपरा रही है।
संघ का उत्सव-दर्शन एवं छह आधिकारिक पर्व

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वर्ष भर में केवल छह उत्सवों को आधिकारिक रूप से मनाता है। संघ की आधिकारिक साहित्य रचना 'संघ उत्सव' में यह स्पष्ट किया गया है कि संगठन ने किसी नए त्योहार का निर्माण नहीं किया है, बल्कि भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा में स्थापित पर्वों को ही राष्ट्रीय पुनर्जागरण के उद्देश्य से चुना है। इन छह उत्सवों का चयन समाज को व्यक्ति-पूजा से दूर रखकर विचार-पूजा और राष्ट्र-सेवा की ओर मोड़ने की एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है।

1.विजयादशमी(श्री राम की रावण पर विजय, महिषासुर मर्दिनी, पांडवों का अस्त्र ग्रहण)
2.वर्ष प्रतिपदा(नव संवत्सर (विक्रम संवत) का प्रारंभ, सृष्टि निर्माण दिवस, सम्राट विक्रमादित्य विजय)
3.हिन्दू साम्राज्य दिवस(विक्रम संवत 1731 (1674 ई.) में छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक एवं हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना)
4.गुरु पूर्णिमा(महर्षि वेदव्यास जयंती एवं प्राचीन भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा)
5.रक्षा बंधन(स्वयंसेवकों का एक-दूसरे को एवं समाज के हाशिए पर खड़े वर्गों को रक्षा-सूत्र बांधकर सामाजिक समरसता का संकल्प)
6.मकर संक्रांति(सूर्य का उत्तरायण प्रवेश; अंधकार से प्रकाश और अज्ञान से ज्ञान की ओर गति)


इन उत्सवों के माध्यम से संघ समाज के विभिन्न वर्गों को अपनी शाखाओं और कार्यक्रमों से जोड़ता है। उदाहरण के लिए, गुरु पूर्णिमा पर किसी जीवित व्यक्ति या संस्थापक को गुरु न मानकर 'भगवा ध्वज' को सर्वोच्च गुरु स्वीकार करना संघ की उस वैचारिक दृढ़ता को दर्शाता है जहाँ सिद्धांत को व्यक्ति से ऊपर स्थान दिया गया है। इसी प्रकार, रक्षाबंधन के पर्व को केवल पारिवारिक दायरे से निकालकर वंचना और अभाव में जीने वाले बस्तियों में जाकर मनाना संघ के सामाजिक विस्तार और अंत्योदय की नीति का परिचायक है।
सांगठनिक विकास यात्रा एवं ऐतिहासिक मील के पत्थर
1925 में नागपुर के एक साधारण मैदान से प्रारंभ होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत के आधुनिक सामाजिक-राजनीतिक इतिहास में एक जटिल और व्यापक विकास यात्रा तय की है। अपने शुरुआती दौर में संघ ने नागपुर और मध्य प्रांत तक सीमित रहते हुए युवाओं के शारीरिक और बौद्धिक शिक्षण पर ध्यान केंद्रित किया। 17 अप्रैल 1926 को संगठन का नाम 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' चुना गया और 28 मई 1926 से नागपुर के मोहिते बाड़ा मैदान में नित्य 'शाखा' की पद्धति प्रारंभ की गई। उसी वर्ष नागपुर से बाहर वर्धा में संघ की पहली बाहरी शाखा खुली।
संघ के शुरुआती दौर में स्वयंसेवकों का गणवेश खाकी कमीज, खाकी निक्कर और खाकी टोपी हुआ करता था, जिसे सैन्य अनुशासन से प्रेरित होकर अपनाया गया था। 1930 में खाकी टोपी के स्थान पर काली टोपी को शामिल किया गया। वर्ष 1928 में प्रथम बार 'प्रतिज्ञा' (दीक्षा) समारोह आयोजित हुआ और 1929 के डोके मठ सम्मेलन में डॉ. हेडगेवार को सर्वसम्मति से संघ का 'सरसंघचालक' घोषित किया गया। 1935 में नागपुर के बाहर पहला अधिकारी शिक्षण शिविर पुणे में और 1938 में लाहौर में आयोजित किया गया, जिससे संघ का कार्य उत्तर भारत में तेजी से फैला।
21 जून 1940 को डॉ. हेडगेवार के असामयिक निधन के उपरांत माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरुजी) ने द्वितीय सरसंघचालक के रूप में कार्यभार संभाला। उनके 33 वर्षों के दीर्घकालिक नेतृत्व में संघ का सांगठनिक ढांचा संपूर्ण भारत में सुदृढ़ हुआ और विभिन्न क्षेत्रों में अनुषांगिक संगठनों (जैसे भारतीय मजदूर संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, वनांचल कल्याण आश्रम आदि) का जन्म हुआ।
स्वतंत्रता के पश्चात संघ को कई विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया गया, जिसे निरस्त कराने हेतु संघ ने ऐतिहासिक शांतिपूर्ण सत्याग्रह किया जिसमें लगभग 78,000 स्वयंसेवकों ने अपनी गिरफ्तारियां दीं। न्यायमूर्ति आत्मचरण आयोग द्वारा जांच के पश्चात जुलाई 1949 में यह प्रतिबंध समाप्त हुआ और संघ ने अपना लिखित संविधान अंगीकार किया। 1975 में जब इंदिरा गांधी सरकार द्वारा आपातकाल लागू किया गया, तब संघ पर पुनः प्रतिबंध लगा और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए चलाए गए आंदोलन में संघ के कार्यकर्ताओं ने अग्रणी भूमिका निभाई। इन संघर्षों ने संघ की आंतरिक सांगठनिक दृढ़ता को और अधिक बल प्रदान किया।
शताब्दी वर्ष, समकालीन विस्तार एवं 'पंच परिवर्तन'
अपने गठन के सौवें वर्ष (1925–2025/2026) में प्रवेश करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी और सामाजिक संगठनों में स्थान रखता है। संघ की कार्यप्रणाली का मूल आधार आज भी वही 'दैनिक शाखा' है, जिसकी शुरुआत 1926 में नागपुर से हुई थी।
अपने शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संघ ने केवल सांगठनिक उत्सव मनाने के बजाय समाज सुधार और राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिए 'पंच परिवर्तन' का एक व्यापक ढांचा प्रस्तुत किया है। यह पंच परिवर्तन समकालीन भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियों के समाधान के रूप में तैयार किया गया है।
पहला परिवर्तन 'सामाजिक समरसता' है, जिसका उद्देश्य हिंदू समाज से जातिगत विषमता, अस्पृश्यता और संकीर्ण भेदभाव को पूरी तरह समाप्त कर एक समरस समाज की स्थापना करना है। दूसरा परिवर्तन 'कुटुंब प्रबोधन' है, जिसके अंतर्गत आधुनिकता के दौर में टूटते पारिवारिक ताने-बाने को बचाना और परिवारों में मानवीय एवं सांस्कृतिक मूल्यों का सिंचन करना शामिल है। तीसरा परिवर्तन 'पर्यावरण संरक्षण' है, जो जल संरक्षण, प्लास्टिक उन्मूलन और व्यापक वृक्षारोपण जैसे व्यावहारिक कार्यों के माध्यम से प्रकृति के साथ संतुलन बनाने पर जोर देता है। चौथा परिवर्तन 'स्वदेशी आचरण' है, जिसका लक्ष्य भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए स्थानीय उत्पादों, स्वदेशी सोच और अपनी भाषाओं के प्रयोग को प्राथमिकता देना है। पांचवां परिवर्तन 'नागरिक कर्तव्य' है, जिसके माध्यम से प्रत्येक नागरिक में कानून का पालन करने, नागरिक अनुशासन बनाए रखने और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि रखने की चेतना जगाई जा रही है।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्थापना दिवस (विजयादशमी) केवल एक ऐतिहासिक तिथि या किसी संगठन के वार्षिक उत्सव का स्मरण मात्र नहीं है, बल्कि यह भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और नागरिक जीवन को पुनर्जीवित करने के दीर्घकालिक संकल्प का प्रतीक है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में जिस 'व्यक्ति निर्माण' की अवधारणा की नींव रखी थी, उसका मूल ध्येय नागरिकों के चरित्र का गठन कर राष्ट्र को आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी बनाना था।
विजयादशमी के पर्व से जुड़े 'धर्म की विजय', 'संगठित शक्ति' और 'सीमोल्लंघन' के प्रतीकों को आधुनिक संदर्भों में ढालकर संघ ने एक ऐसी कार्यपद्धति विकसित की है जो बीते 100 वर्षों से निरंतर गतिमान है। अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश करते हुए, संघ द्वारा प्रस्तुत 'पंच परिवर्तन' की अवधारणा इस बात का प्रमाण है कि संगठन अपनी स्थापना के मूल ध्येय—संगठित, समरस और अनुशासित समाज के निर्माण—पर केंद्रित रहते हुए समकालीन युग की आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को निरंतर रूपांतरित कर रहा है।

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