डॉo संतोष आनन्द मिश्र, इतिहासकार, लेखक, ब्लॉगर, साहित्यकार, मिश्रौली, दरभंगा, बिहार
भूमिका
महिषासुर भारतीय पौराणिक आख्यानों, शाक्त धर्मशास्त्र, कला इतिहास और बहुसंस्कृतिवादी इतिहासलेखन में एक अत्यंत जटिल और बहुआयामी चरित्र के रूप में विद्यमान है। मुख्यधारा की हिंदू संस्कृति और पौराणिक साहित्य में महिषासुर को एक शक्तिशाली आसुरी शक्ति, तमोगुण और अधर्म के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है, जिसका संहार भगवती दुर्गा द्वारा जगत् कल्याण हेतु किया गया था। दूसरी ओर, भारत की कतिपय मूलनिवासी, जनजातीय (विशेष रूप से संथाल और असुर) तथा बहुजन परंपराओं में महिषासुर को एक न्यायप्रिय राजा, लोक-नायक और पूज्य पूर्वज के रूप में स्वीकार किया जाता है। महिषासुर का अध्ययन केवल एक पौराणिक कथा के वाचन तक सीमित न होकर शाक्त दर्शन, मध्यकालीन प्रतिमाशास्त्र, प्राचीन भौगोलिकी और समकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्शों को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम प्रदान करता है।
महिषासुर की उत्पत्ति एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, महिषासुर का जन्म असुर राज रम्भ और जल-भैंस का रूप धारण करने वाली एक असुर महिला (महिषी) के योग से हुआ था। महिष और असुर के इस संकर स्वरूप के कारण उसे महिषासुर कहा गया, और जन्म से ही उसे स्वेच्छा से रूप बदलने की कामरूप शक्ति प्राप्त थी। उसके वंशक्रम में उसकी बहन महिषी और उसके पुत्र गजासुर का उल्लेख भी पुराणों में मिलता है।
महिषासुर ने अपनी शक्ति में वृद्धि करने के उद्देश्य से परमपिता ब्रह्मा की कठोर तपस्या की और यह वरदान प्राप्त किया कि उसकी मृत्यु किसी भी देव, दानव या मानव पुरुष के हाथों न हो सके। इस वरदान से उत्पन्न अहम् और अमरता के भ्रम के वशीभूत होकर उसने तीनों लोकों पर अधिकार जमाने हेतु भयंकर युद्ध छेड़ दिया। सौ वर्षों तक चले देवासुर संग्राम के उपरांत महिषासुर ने देवराज इंद्र को पराजित कर उसके स्वर्गीय सिंहासन पर अधिकार कर लिया और सूर्य, अग्नि, पवन, यम तथा वरुण जैसे लोकपालों के अधिकारों को छीन लिया। पराजित और अधिकार-विहीन देवताओं को स्वर्ग छोड़ कर पृथ्वी पर साधारण जीवों की भांति शरण लेनी पड़ी।
देवी माहात्म्य एवं पौराणिक ग्रंथों में महिषासुर-वध का आख्यान
महिषासुर के अन्यायी शासन से मुक्ति पाने के लिए पराजित देव ब्रह्मा जी के नेतृत्व में भगवान विष्णु और भगवान शिव के समक्ष उपस्थित हुए। देवताओं की व्यथा सुनकर विष्णु और शिव अत्यंत क्रुद्ध हुए। उन परम शक्तियों के क्रोध से और अन्य देवताओं के शरीरों से एक अत्यंत प्रज्वलित दिव्य ऊर्जा (तेजस या शक्ति) का प्रादुर्भाव हुआ। यह समस्त तेजोपुंज आपस में संचित होकर एक प्रज्वलित पर्वत के समान भासित हुआ, जिससे समस्त ब्रह्मांड को आलोकित करने वाली एक दिव्य स्त्री स्वरूप—महादेवी दुर्गा या चण्डिका—का प्रादुर्भाव हुआ।
समस्त देवताओं ने अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र, आभूषण और वाहन देवी को अर्पित किए। भगवान शिव ने अपना त्रिशूल, विष्णु ने चक्र, वायु ने धनुष और बाण, हिमवान ने वाहन के रूप में हिंसक सिंह और इंद्र ने अपना वज्र देवी को सौंपा।
मार्कंडेय पुराण के अंतर्गत निहित 'देवी माहात्म्य' (दुर्गा सप्तशती) के द्वितीय से चतुर्थ अध्याय में महिषासुर और देवी चण्डिका के मध्य हुए युद्ध का विस्तृत वर्णन मिलता है। महिषासुर के महान सेनापतियों जैसे चक्षुर और चामर तथा उसकी विशाल चतुरंगिणी सेना को देवी और उनके सिंह ने नष्ट कर दिया। इसके पश्चात महिषासुर स्वयं मायावी रूप धारण कर युद्ध भूमि में उतरा। वह अपनी माया से रूप बदलकर देवी को भ्रमित करने का प्रयास करता रहा, किंतु अंततः देवी ने उसका संहार कर दिया।
महिषासुर के वध के पश्चात देवी को 'महिषासुरमर्दिनी' की सार्वभौमिक उपाधि प्राप्त हुई। यह आख्यान केवल मार्कंडेय पुराण तक सीमित न होकर वामन पुराण, स्कंद पुराण, वराह पुराण और कालिका पुराण में भी सूक्ष्म भाषाई व कथात्मक भिन्नताओं के साथ वर्णित है।
दार्शनिक, आध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रतीकवाद
मुख्यधारा के शाक्त दर्शन और भारतीय अद्वैत विचार में महिषासुर का वध केवल एक बाह्य सैन्य संघर्ष नहीं है, बल्कि यह मानव मन के भीतर निरंतर चलने वाले आंतरिक सूक्ष्म संघर्ष का रूपात्मक निरूपण है। महिषासुर की निरंतर रूप बदलने की क्षमता मानव मन की चंचल प्रवृत्तियों और कभी न समाप्त होने वाली वासनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। जब एक भौतिक या मानसिक इच्छा पूर्ण होती है या दबाई जाती है, तो वह तुरंत दूसरा रूप धारण कर लेती है। इस मानसिक भटकाव और आकुलता को वेदांत व योग दर्शन में 'विक्षेप शक्ति' कहा जाता है, जो मूलतः रजोगुण की अतिशयता से उत्पन्न होती है। देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर के इस रूपांतरण चक्र को समाप्त करना साधक द्वारा अपने रजोगुणी विकारों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करने का आध्यात्मिक प्रतीक है।
इसके अतिरिक्त, महिषासुर का महिष (भैंस) स्वरूप अज्ञान, आलस्य, जड़ता और पशु-वृत्ति (तमोगुण) को निरूपित करता है, जबकि देवी दुर्गा विशुद्ध चेतन, परम ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की प्रतीक हैं। महिषासुर का संहार यह दर्शाता है कि अज्ञान पर ज्ञान की विजय सहज नहीं होती; इसके लिए समस्त मानसिक और आत्मिक शक्तियों का एकीकरण आवश्यक है। देवताओं द्वारा अपनी-अपनी शक्तियों को देवी में समाहित करना इस बात का दार्शनिक संकेत है कि जब बिखरी हुई सात्विक वृत्तियाँ एकीभूत होती हैं, तभी वे संगठित अहंकार और पाशविक मूल-प्रवृत्तियों का उन्मूलन करने में सक्षम होती हैं।
स्तोत्र परंपरा और महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम
महिषासुर-वध की गाथा को स्तुति के रूप में अमर करने वाली रचना 'महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम' (प्रारंभिक पद 'अयि गिरिनंदिनि') संस्कृत स्तोत्र-साहित्य की एक अद्वितीय उपलब्धि है। पारंपरिक रूप से इसे आठवीं शताब्दी के दार्शनिक आद्य शंकराचार्य की कृति माना जाता है, यद्यपि आधुनिक पाठ्य-समीक्षकों और पांडुलिपियों के अध्ययन से यह भी संकेत मिलता है कि यह कवि रामकृष्ण द्वारा रचित 'भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलि स्तोत्र' का अंग हो सकती है।
संस्कृत छंदशास्त्र की दृष्टि से यह स्तोत्र कुल 21 पद्य-खंडों में संरचित है, जहाँ प्रत्येक पद का अंत "जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते" की लयबद्ध टेक के साथ होता है। इस स्तोत्र में ओज गुण और ध्वन्यात्मक अनुप्रास का अद्भुत प्रयोग किया गया है। इसकी पदावली युद्ध-भूमि के वाद्ययंत्रों (दुंदुभि, मृदंग) और देवी के नूपुरों की ध्वनि का संगीतात्मक अनुकरण करती है। काव्य-शास्त्रीय दृष्टि से यह स्तोत्र देवी के दो परस्पर विरोधी रूपों—रणचंडी का भयंकर संहारक रूप और जगतजननी का परम कोमल व करुणामय रूप—को एक ही प्रवाह में समेटता है, जिससे यह शाक्त भक्ति परंपरा का एक केंद्रीय स्तंभ बन जाता है।
कला एवं प्रतिमाशास्त्र में महिषासुरमर्दिनी का विकास
भारतीय मूर्तिकला और वास्तुकला के इतिहास में महिषासुरमर्दिनी का अंकन ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों से लेकर मध्यकाल तक एक सुस्पष्ट और क्रमिक प्रतिमाशास्त्रीय विकास को दर्शाता है। प्राचीनतम निरूपणों से लेकर जटिल मध्यकालीन मंदिर-शिल्प तक देवी और महिषासुर के संबंधों का कलात्मक चित्रण बदलता रहा है।
प्रारंभिक कुषाण काल (प्रथम से तृतीय शताब्दी ईस्वी) में, मथुरा कला शैली के अंतर्गत निर्मित पट्टिकाओं में देवी को अक्सर द्विभुज या चतुर्भुज रूप में दर्शाया गया है। इस प्रारंभिक चरण में देवी बिना किसी जटिल अस्त्र-शस्त्र या सिंह-वाहन के, केवल अपने हाथों से एक प्राकृतिक भैंस को दबाते हुए या उसकी गर्दन मरोड़ते हुए दिखाई देती हैं। गुप्त काल (चतुर्थ से छठी शताब्दी ईस्वी) तक आते-आते इस रूप का शास्त्रीय मानकीकरण हुआ, जिसमें देवी की भुजाओं की संख्या बढ़कर अष्टभुज या दशभुज हो गई और उनके हाथों में देवों द्वारा प्रदत्त विभिन्न आयुध स्पष्ट रूप से अंकित किए जाने लगे।
दक्षिण भारत में पल्लव और चालुक्यकालीन कला (सातवीं से नौवीं शताब्दी ईस्वी) ने इस प्रतिमाशास्त्र को एक नई नाटकीय ऊँचाई प्रदान की। महाबलिपुरम के महिषासुरमर्दिनी मण्डप में स्थित प्रसिद्ध पल्लव राहत-शिल्प में देवी को अपने सिंह पर सवार होकर धनुष से बाण बरसाते हुए दिखाया गया है, जबकि महिषासुर को एक मानव शरीर और भैंस के सिर वाले (महिष-मुंड) शक्तिशाली गदाधारी योद्धा के रूप में चित्रित किया गया है। इसके विपरीत, ऐहोल और एलोरा के चालुक्य व राष्ट्रकूट शिल्पों में देवी को महिषासुर के पीठ या गर्दन पर पैर रखकर सीधे त्रिशूल से उसका वध करते हुए दर्शाया गया है। दक्षिण-पूर्व एशिया, विशेष रूप से जावा (इंडोनेशिया) के प्रमबनन मंदिर समूह में पाई जाने वाली नौवीं शताब्दी की प्रतिमाओं की विशेषता यह है कि वहाँ देवी महिषासुर का संहार करते हुए भी परम शांत, सौम्य और वीतराग मुखमुद्रा में विराजमान हैं।
ऐतिहासिक एवं भौगोलिक परिप्रेक्ष्य: महिष मंडल और मैसूर का प्रश्न
महिषासुर के आख्यान का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और भौगोलिक आयाम दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य और विशेष रूप से मैसूर क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। प्राचीन अभिलेखीय और साहित्यिक साक्ष्य इस क्षेत्र का संबंध 'महिष' नाम से जोड़ते हैं।
सम्राट अशोक के शासनकाल (लगभग 245 ईसा पूर्व) के दौरान पाटलिपुत्र में आयोजित तृतीय बौद्ध संगीति के उपरांत विभिन्न दूरस्थ क्षेत्रों में धर्म प्रचारकों को भेजा गया था। बौद्ध ग्रन्थ 'महावंश' और मौर्यकालीन संदर्भों के अनुसार, भिक्षु महादेव को जिस क्षेत्र में भेजा गया था, उसे 'महिष मंडल' के नाम से दर्ज किया गया है। प्राचीन कन्नड़ और तमिल संगम साहित्य में भी इस क्षेत्र को 'एरुमैयूर' या 'एरुमैनाडु' कहा गया है, जहाँ द्रविड़ भाषा 'एरुमै' का शाब्दिक अर्थ भैंस होता है। भाषाई विकास के क्रम में यही नाम 'महिषूर' और कालांतर में 'मैसूर' में परिवर्तित हुआ।
तथापि, महिष मंडल की वास्तविक भौगोलिक पहचान पर इतिहासविदों में विद्वतापूर्ण मतभेद रहा है। डॉ. जे. एफ. फ्लीट जैसे औपनिवेशिक काल के इतिहासकारों का तर्क था कि प्राचीन महिष मंडल वास्तव में नर्मदा नदी के तट पर स्थित 'माहिष्मती' (वर्तमान मानधाता/महेश्वर) का क्षेत्र था। इसके विपरीत, आधुनिक बहुजन और दलित इतिहासलेखन में महिषासुर को एक ऐतिहासिक बौद्ध अथवा मूलनिवासी शासक के रूप में पुनर्परिभाषित किया गया है। इस वैकल्पिक दृष्टिकोण के अनुसार, राजा महिष ने महिष मंडल में समतावादी, लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों के आधार पर शासन किया था। इस वैचारिक धारा का मानना है कि वैदिक या ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना के विस्तार के समय स्थानीय न्यायप्रिय शासक को नकारात्मक रूप में चित्रित करके पौराणिक देव-दानव संघर्ष में परिवर्तित कर दिया गया।
जनजातीय एवं लोक-परंपराएँ: हुदूर् दुर्गा और दाँसाई नृत्य
पूर्वी भारत के छोटानागपुर पठार और आसपास के क्षेत्रों में निवास करने वाले संथाल (खेरवाल) और असुर जनजातीय समुदाय महिषासुर के संबंध में मुख्यधारा से पूरी तरह भिन्न एक समानांतर और जीवंत मौखिक परंपरा रखते हैं।
इन जनजातीय समुदायों में महिषासुर को पौराणिक असुर न मानकर अपना महान पूर्वज, रक्षक और प्रतापी राजा स्वीकार किया जाता है, जिन्हें वे 'हुदूर् दुर्गा' के नाम से संबोधित करते हैं। संथाली भाषा के अर्थशास्त्र के अनुसार, 'हुदूर्' का अर्थ बिजली अथवा अत्यंत कठोर सुरक्षा कवच होता है और 'दुर्गा' का अर्थ रक्षक होता है; अतः हुदूर् दुर्गा का अर्थ "बिजली के समान दृढ़ रक्षक" है। संथाल मौखिक आख्यानों के अनुसार, राजा हुदूर् दुर्गा को युद्ध में सीधे पराजित करना असंभव था। इसलिए उनके विरोधियों ने एक सुंदर स्त्री के माध्यम से छल-कपट का सहारा लिया। उस स्त्री ने राजा को अपने रूप-पाश में बांधकर विवाह किया और विवाह के सातवें दिन रात्रि में कपटपूर्वक उनकी हत्या कर दी। अपने राजा की मृत्यु और तत्पश्चात हुए आक्रमण के कारण जनजातीय समाज को अपनी भूमि छोड़कर जंगलों और पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी।
इस ऐतिहासिक सांस्कृतिक आघात की स्मृति में, जिस समय मुख्यधारा का समाज शरद ऋतु में दुर्गा पूजा और विजयादशमी का उत्सव मनाता है, उस समय संथाल समुदाय उत्सव मनाने के बजाय 'दाँसाई' (Dasai) नामक पर्व का आयोजन करता है। दाँसाई के दौरान संथाल पुरुष प्रतीकात्मक रूप से नारियों का वेश धारण करते हैं, अपने चेहरों को छिपाते हैं और 'बुआंग' वाद्ययंत्र बजाते हुए गाँव-गाँव जाकर नृत्य करते हैं। इस नृत्य के दौरान वे "हाए रे हाए रे" का करुण गायन करते हैं, जो उनके खोए हुए नायकों (अयान, काजोल, दिवि और दुर्गा) की खोज और अपने महान पूर्वज की पराजय का शोक व्यक्त करता है।
निष्कर्ष
महिषासुर का आख्यान भारतीय सभ्यता के भीतर धार्मिक, दार्शनिक, कलात्मक और सामाजिक-राजनीतिक धाराओं के एक जटिल संगम को निरूपित करता है। जहाँ एक ओर शाक्त धर्मशास्त्र में महिषासुर का वध मानव मन के भीतर निहित अज्ञान, काम रूपी वासना और पाशविक अहंकार के विनाश का दार्शनिक प्रतीक है, वहीं कला इतिहास में उसने कुषाण काल से लेकर मध्ययुगीन भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया तक मूर्तिकारों को गतिशील और उत्कृष्ट शिल्प बनाने की प्रेरणा दी है। इसके साथ ही, संथाल और असुर जनजातियों का 'हुदूर् दुर्गा' का आख्यान और 'दाँसाई' नृत्य यह स्थापित करता है कि भारतीय सांस्कृतिक इतिहास केवल एकरेखीय नहीं है, बल्कि उसमें सबअल्टर्न और जनजातीय समूहों की वैकल्पिक स्मृतियाँ भी उतनी ही गहराई से समाहित हैं। महिषासुर का यह बहुआयामी अध्ययन भारतीय परंपरा की विविधता, वैचारिक गहराई और बहु-सांस्कृतिक संरचना को पूर्णता में समझने का अवसर प्रदान करता है।



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