परमहंस योगानंद जी : पूर्व और पश्चिम के बीच आध्यात्मिक सेतु (5 जनवरी 1893 – 7 मार्च 1952)

परमहंस योगानंद जी : पूर्व और पश्चिम के बीच आध्यात्मिक सेतु  (5 जनवरी 1893 – 7 मार्च 1952)

परमहंस योगानंद (5 जनवरी 1893 – 7 मार्च 1952) आधुनिक युग के महान योगी, संत, दार्शनिक और विश्वविख्यात आध्यात्मिक शिक्षक थे। वे उस विरल परंपरा के प्रतिनिधि हैं जिन्होंने भारतीय योग-दर्शन को वैज्ञानिक, सार्वभौमिक और व्यावहारिक रूप में विश्व के सामने प्रस्तुत किया। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘योगी कथामृत’ (Autobiography of a Yogi) ने करोड़ों लोगों के जीवन को आध्यात्मिक दिशा दी और पूर्व व पश्चिम के बीच एक सशक्त सेतु का निर्माण किया।

प्रारंभिक जीवन एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति

परमहंस योगानंद का जन्म 5 जनवरी 1893 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर नगर में हुआ। उनका बचपन का नाम मुकुंद लाल घोष था। पिता भगवतीचरण घोष बंगाल-नागपुर रेलवे में उच्च पद पर थे और माता ज्ञानप्रभा देवी गहन आध्यात्मिक संस्कारों से युक्त थीं। माता के सान्निध्य में ही योगानंद के भीतर ईश्वर-चिंतन की लौ प्रज्वलित हुई।
बाल्यावस्था से ही मुकुंद में संन्यास, ध्यान और आत्मसाक्षात्कार के प्रति गहरी आकांक्षा थी। वे अनेक संतों और योगियों की खोज में निकल पड़ते थे। उनके जीवन का निर्णायक मोड़ तब आया जब स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि उनके गुरु बने। श्रीयुक्तेश्वर न केवल योग के आचार्य थे, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से अध्यात्म की व्याख्या करने वाले मनीषी भी थे।

संन्यास दीक्षा और गुरु-शिष्य परंपरा

1915 में मुकुंद ने संन्यास ग्रहण किया और उनका नाम स्वामी योगानंद रखा गया। 1917 में उन्होंने कोलकाता में योगदा सत्संग सोसाइटी (YSS) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य था—योग, ध्यान और आत्मानुशासन के माध्यम से मानव जीवन का सर्वांगीण विकास।
श्रीयुक्तेश्वर के निर्देशन में योगानंद ने क्रियायोग की गूढ़ साधना को आत्मसात किया। क्रियायोग, श्वास-प्रश्वास, ध्यान और चेतना के संतुलन पर आधारित एक वैज्ञानिक योग-पद्धति है, जिसे योगानंद ने सरल और सार्वभौमिक भाषा में विश्व के सामने रखा।

अमेरिका यात्रा और वैश्विक प्रभाव

1920 में योगानंद जी ने अमेरिका के बोस्टन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय धार्मिक सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनके व्याख्यान ने श्रोताओं को गहराई से प्रभावित किया। यहीं से पश्चिम में उनके आध्यात्मिक अभियान की शुरुआत हुई।
उन्होंने अमेरिका में Self-Realization Fellowship (SRF) की स्थापना की, जो आज भी विश्वभर में योग, ध्यान और आत्मबोध की शिक्षा प्रदान कर रही है। न्यूयॉर्क, लॉस एंजेलिस सहित अनेक शहरों में उनके प्रवचन अत्यंत लोकप्रिय हुए। उन्होंने ईसाई धर्म और भारतीय वेदांत के बीच गूढ़ सामंजस्य को रेखांकित किया और बताया कि सत्य एक है, मार्ग अनेक।

योगी कथामृत’ : आध्यात्मिक साहित्य की अमर कृति

1946 में प्रकाशित ‘योगी कथामृत’ योगानंद जी की आत्मकथा ही नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक महाकाव्य है। इसमें उनके जीवन के चमत्कारी प्रसंग, गुरु-परंपरा, योग-साधना और आत्मसाक्षात्कार के अनुभव वर्णित हैं। इस पुस्तक ने स्टीव जॉब्स जैसे आधुनिक विचारकों को भी गहराई से प्रभावित किया।
यह कृति बताती है कि योग केवल संन्यासियों के लिए नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी आत्मोन्नति का सशक्त माध्यम है।

दर्शन और शिक्षाएँ

परमहंस योगानंद का दर्शन सरल, व्यावहारिक और सार्वभौमिक था। उनकी प्रमुख शिक्षाएँ थीं—
आत्मसाक्षात्कार जीवन का परम लक्ष्य है।
ध्यान और क्रियायोग से मन की चंचलता शांत होती है।
धर्म का सार प्रेम है, न कि कर्मकांड।
विज्ञान और अध्यात्म परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
प्रत्येक मनुष्य के भीतर ईश्वर की चेतना विद्यमान है।

महाप्रयाण और आध्यात्मिक विरासत

7 मार्च 1952 को लॉस एंजेलिस में भारत के तत्कालीन राजदूत की विदाई सभा के दौरान, राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के पाठ के पश्चात योगानंद जी ने समाधि अवस्था में देह त्याग दिया। उनका जाना भी एक योगी की चेतन विदाई था।
आज योगदा सत्संग सोसाइटी और सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप के माध्यम से उनकी शिक्षाएँ विश्व के कोने-कोने में फैली हुई हैं। ध्यान, योग और आत्मचिंतन की आधुनिक वैश्विक लहर में योगानंद जी का योगदान अमिट है।

उपसंहार

परमहंस योगानंद जी केवल एक संत या योगी नहीं, बल्कि मानव चेतना के जाग्रत द्रष्टा थे। उन्होंने सिद्ध किया कि आध्यात्मिकता किसी देश, धर्म या संस्कृति की बपौती नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की साझा धरोहर है। उनका जीवन और कृतित्व आज भी हमें भीतर झाँकने, स्वयं को जानने और ईश्वर से साक्षात्कार की प्रेरणा देता है।

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