क्रांतिकारी विठ्ठल लक्ष्मण कोतवाल(6 सितंबर 1916 – 2 जनवरी 1943)

क्रांतिकारी विठ्ठल लक्ष्मण कोतवाल
(6 सितंबर 1916 – 2 जनवरी 1943)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल बड़े नगरों और प्रसिद्ध नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें ग्रामीण अंचलों के ऐसे असंख्य वीर सपूत भी शामिल हैं, जिन्होंने गुमनामी में रहते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। विठ्ठल लक्ष्मण कोतवाल ऐसे ही एक महान, निर्भीक और त्यागमय क्रांतिकारी थे, जिन्होंने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध, जनजागरण और भूमिगत गतिविधियों के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी। उन्हें महाराष्ट्र के ठाणे जिले में “आदिवासी क्रांति के नायक” के रूप में स्मरण किया जाता है।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

विठ्ठल लक्ष्मण कोतवाल का जन्म 6 सितंबर 1916 को महाराष्ट्र के ठाणे जिले के एक साधारण ग्रामीण परिवार में हुआ। उनका बचपन अत्यंत सामान्य परिस्थितियों में बीता। ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों, किसानों और आदिवासियों के शोषण को उन्होंने बहुत निकट से देखा। यही अनुभव उनके मन में ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष और विद्रोह की भावना का बीजारोपण बने।
प्रारंभ से ही वे साहसी, आत्मसम्मानी और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने वाले स्वभाव के थे। शिक्षा के साथ-साथ वे सामाजिक चेतना से भी जुड़े और राष्ट्रीय आंदोलनों की ओर आकृष्ट हुए।

स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश

1930 के दशक में जब देशभर में राष्ट्रीय आंदोलन तीव्र हो रहा था, तब विठ्ठल लक्ष्मण कोतवाल भी कांग्रेस और क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े। भारत छोड़ो आंदोलन (1942) ने उनके जीवन को निर्णायक मोड़ दिया। इस आंदोलन के दौरान उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि वे केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ब्रिटिश सत्ता को जड़ से हिलाने के लिए सशक्त प्रतिरोध करेंगे।

भूमिगत संघर्ष और “आदिवासी दस्ता”

भारत छोड़ो आंदोलन के बाद विठ्ठल कोतवाल भूमिगत हो गए। उन्होंने ठाणे जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में एक सशस्त्र क्रांतिकारी दस्ता संगठित किया। इस दस्ते में मुख्यतः किसान, आदिवासी युवक और श्रमिक शामिल थे।
उनकी गतिविधियों में शामिल थे—
ब्रिटिश प्रशासनिक कार्यालयों पर हमले

टेलीफोन और टेलीग्राफ लाइनें काटना

सरकारी खजानों और हथियारों पर धावा

ब्रिटिश अधिकारियों की आवाजाही में बाधा

ग्रामीण जनता में स्वतंत्रता की चेतना फैलाना

उन्होंने अंग्रेजी सत्ता की नींव को हिला देने वाला एक समानांतर जनआंदोलन खड़ा कर दिया।

ब्रिटिश सत्ता के लिए चुनौती

विठ्ठल लक्ष्मण कोतवाल की गतिविधियाँ इतनी प्रभावशाली थीं कि ब्रिटिश सरकार उन्हें “अत्यंत खतरनाक विद्रोही” मानने लगी। उनके सिर पर इनाम घोषित किया गया। अंग्रेजी पुलिस और सेना ने उन्हें पकड़ने के लिए व्यापक अभियान चलाया, किंतु स्थानीय जनता का सहयोग और दुर्गम भौगोलिक क्षेत्र उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखता रहा।

गिरफ्तारी और बलिदान

लगातार संघर्ष और विश्वासघात के कारण अंततः वे ब्रिटिश पुलिस के हाथों घायल अवस्था में पकड़े गए। उन्हें गंभीर चोटें आई थीं और चिकित्सा सहायता के बजाय उन्हें अमानवीय यातनाओं का सामना करना पड़ा।
2 जनवरी 1943 को मात्र 26 वर्ष की अल्पायु में इस महान क्रांतिकारी ने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। उनकी मृत्यु ने पूरे ठाणे जिले और महाराष्ट्र में शोक के साथ-साथ विद्रोह की आग को और प्रज्वलित कर दिया।

विचारधारा और व्यक्तित्व

विठ्ठल लक्ष्मण कोतवाल—
निःस्वार्थ देशभक्त
संगठनकर्ता और रणनीतिकार
आदिवासी और ग्रामीण समाज के सच्चे प्रतिनिधि
साहस, त्याग और नेतृत्व के प्रतीक
थे। वे मानते थे कि जब सत्ता अन्यायपूर्ण हो जाए, तब उसके विरुद्ध संघर्ष करना नागरिक का कर्तव्य है।

स्मृति और विरासत

आज भी महाराष्ट्र में—
विठ्ठल कोतवाल स्मारक
विद्यालयों, सड़कों और संस्थानों के नाम
लोकगीतों और जनकथाओं
के माध्यम से उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। वे विशेष रूप से आदिवासी समाज के लिए प्रेरणा-स्त्रोत हैं।

निष्कर्ष

6 सितंबर 1916 को जन्मा यह वीर सपूत 2 जनवरी 1943 को मातृभूमि के लिए अमर हो गया। विठ्ठल लक्ष्मण कोतवाल का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि स्वतंत्रता केवल बड़े नेताओं के प्रयासों से नहीं मिली, बल्कि गाँव-गाँव, जंगल-जंगल और आदिवासी अंचलों में बहाए गए रक्त और बलिदान से प्राप्त हुई।
उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि
“देश के लिए जिया गया हर क्षण और उसके लिए दी गई हर आहुति अमर होती है।”

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