मोरेश्वर वासुदेव अभ्यंकर: जीवन, संघर्ष और राष्ट्र सेवा ( 19 अगस्त 1886- 2 जनवरी 1935)

मोरेश्वर वासुदेव अभ्यंकर: जीवन, संघर्ष और राष्ट्र सेवा ( 19 अगस्त 1886-  2 जनवरी 1935)


प्रारंभिक जीवन और जन्म

मोरेश्वर वासुदेव अभ्यंकर का जन्म 19 अगस्त 1886 को महाराष्ट्र के नागपुर क्षेत्रों में हुआ था। वे एक शिक्षित और संवेदनशील परिवार में जन्मे, जिन्होंने शुरू से ही देश की सामजिक-राजनैतिक परिस्थितियों को गहराई से समझा और अंग्रेजी शासन के अत्याचारों के खिलाफ अपने मन में विरोध की भावना पाली। उनकी यह चेतना बाद में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरणा बनी। 

क्रांतिकारी बनने का मार्ग

मोरेश्वर अभ्यंकर ने कानून की पढ़ाई पूरी की और अधिवक्ता बने। वकालत के माध्यम से उन्होंने समाज में फैले अन्याय का प्रत्यक्ष अनुभव किया। धीरे-धीरे वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य राष्ट्रवादी संगठनों से जुड़ते गए और गति और आज़ादी की मांग को आगे बढ़ाने लगे। वे विशेष रूप से टिलकवादी विचारधारा से प्रेरित थे और यह मानते थे कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संगठित आंदोलन और आत्म-बलिदान आवश्यक है। 

स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका

अभ्यंकर जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समर्पित सदस्य थे और नागपुर सहित विदर्भ क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना जगाने में योगदान दिया। उन्होंने युवाओं को संगठित किया, अंग्रेजी शासन की नीतियों के विरुद्ध जन-जागरूकता अभियान चलाए और भारतीय आत्म-सम्मान की भावना को प्रोत्साहित किया। 

गिरफ्तारी, संघर्ष और दृढ़ता

उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों और स्वाधीनता के लिए प्रतिबद्धता के कारण अंग्रेज़ी प्रशासन ने उन्हें कई बार निगरानी में रखा और प्रतिबंधित किया। बावजूद इसके उनका हौसला और समर्पण कभी नहीं टूटा। जेल तथा दमनकारी नीतियों के खिलाफ उनके संघर्ष ने अन्य सेनानियों को भी प्रेरित किया और आज़ादी की राह में उनके कदम और मजबूत किए। 

मृत्यु और पुण्यतिथि

मोरेश्वर वासुदेव अभ्यंकर ने 2 जनवरी 1935 को अंतिम सांस ली। यह दिन आज़ादी की लड़ाई में एक समर्पित योद्धा की पुण्यतिथि के रूप में याद किया जाता है। उनके निधन ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक गहरा आघात दिया, पर उनके विचार तथा आदर्श आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन गए। 

योगदान और विरासत

मोरेश्वर वासुदेव अभ्यंकर का जीवन एवं संघर्ष यह दर्शाता है कि स्वतंत्रता केवल महान सेनानियों का नहीं, अपितु अनगिनत देशभक्तों का बलिदान और समर्पण है। उन्होंने दृढ़ता, साहस और निष्ठा के साथ अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयास किया और युवाओं को प्रेरित किया कि वे भी राष्ट्र-सेवा के पथ पर अग्रसर हों। 

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